सनक में हनक दिखाते बिहार के 'सम्राट'

घोषणाओं का खुला बाजार, नीति कागजों में कैद और नीयत पर बड़ा सवाल

-रितेश सिन्हा

बिहार की राजनीति में घोषणाएं का आकार बड़ा होता जा रहा है और उनके परिणाम छोटे। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने योजना एवं विकास विभाग की समीक्षा बैठक में जिस तरह नए पोर्टल, नए आयोग, हर जिले का अलग बजट, हर प्रखंड की विकास योजना और 2037 तक "विकसित बिहार" का विजन पेश किया, उससे लगा मानो बिहार की दशकों पुरानी समस्याओं का समाधान प्रशासनिक नवाचारों की नई पैकेजिंग में मिल गया हो। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन योजनाओं का हिसाब आज तक सरकार नहीं दे पाई, उनके ऊपर नई घोषणाओं की इमारत आखिर किस भरोसे खड़ी की जा रही है?

मुख्यमंत्री ने कहा कि विधायकों एवं विधान परिषद सदस्यों के लिए एक समर्पित पोर्टल बनाया जाएगा, जिससे योजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन बिहार सरकार के पास पहले से ई-ऑफिस, आरटीपीएस, मुख्यमंत्री लोक शिकायत निवारण प्रणाली, विभागीय एमआईएस और डिजिटल मॉनिटरिंग व्यवस्था मौजूद है। यदि ये प्रभावी हैं तो नया पोर्टल क्यों? और यदि प्रभावी नहीं हैं तो उनकी विफलता की जवाबदेही किसकी है? शासन का संकट तकनीक की कमी नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी है।

मुख्यमंत्री ने बिहार में नीति आयोग की तर्ज पर नया आयोग गठित करने की भी घोषणा की। लेकिन राज्य में पहले से योजना एवं विकास विभाग, वित्त विभाग, आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय और जिला योजना समितियां काम कर रही हैं। यदि ये संस्थाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं तो नई संस्था कौन-सा चमत्कार कर देगी? बिहार को संस्थाओं का विस्तार नहीं, संस्थागत जवाबदेही चाहिए।

मुख्यमंत्री ने प्रत्येक जिले का अलग बजट और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकास योजना बनाने का निर्देश दिया। यह अवधारणा आकर्षक अवश्य है, लेकिन बिहार की सबसे बड़ी समस्या योजना बनाना नहीं, बल्कि योजना पूरी करना है। कई परियोजनाएं वर्षों तक अधूरी रहती हैं, लागत बढ़ती रहती है और जनता इंतजार करती रहती है। ऐसे में नया ढांचा तब तक केवल प्रशासनिक प्रयोग रहेगा, जब तक सरकार समयबद्ध क्रियान्वयन और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं करती।

समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने गुणवत्ता, पारदर्शिता और समयबद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। लेकिन यदि यही शासन की पहचान होती, तो बार-बार उन्हीं योजनाओं की समीक्षा करने और उन्हीं अधिकारियों को वही निर्देश देने की नौबत क्यों आती? सरकार को बताना चाहिए कि पिछले वर्षों में कितनी परियोजनाएं तय समय पर पूरी हुईं, कितनों की लागत बढ़ी और कितने अधिकारियों पर लापरवाही के लिए कार्रवाई हुई।

सरकार 2037 तक "विकसित बिहार" का सपना दिखा रही है, लेकिन आर्थिक तस्वीर अब भी चुनौतीपूर्ण है। बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार राज्य की प्रति व्यक्ति आय लगभग ₹69,321 है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। उद्योग का राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान लगभग 24 प्रतिशत के आसपास है, जबकि बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि विकसित बिहार का आधार क्या होगा—उद्योग, निवेश और रोजगार या केवल विजन दस्तावेज?

निवेश के मोर्चे पर भी सरकार को जवाब देना चाहिए। बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान के 2019 मूल्यांकन में बिहार 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 26वें स्थान पर रहा था। यदि कारोबारी माहौल में बड़ा सुधार हुआ है तो सरकार बताए कि पिछले कुछ वर्षों में कितने बड़े निजी निवेश आए, कितनी नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित हुईं और कितने स्थायी रोजगार सृजित हुए। केवल नए आयोग और नए पोर्टल निवेशकों का भरोसा नहीं जीत सकते।

रोजगार के मोर्चे पर भी तस्वीर संतोषजनक नहीं है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि बिहार में युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यही कारण है कि लाखों युवा आज भी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने समीक्षा बैठक में आकांक्षी जिलों के साथ-साथ सभी जिलों के लिए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकास कार्ययोजना तैयार करने तथा प्रत्येक प्रखंड के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने का निर्देश दिया। बिहार की वास्तविक समस्या योजनाओं का अभाव नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की विफलता है।

पिछले डेढ़ दशक में राज्य में सैकड़ों योजनाओं का शिलान्यास हुआ, हजारों करोड़ रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन अनेक परियोजनाएं वर्षों बाद भी अधूरी हैं। सरकार यदि वास्तव में विकास को लेकर गंभीर है तो उसे नई योजनाएं बनाने से पहले पुरानी योजनाओं का सामाजिक और वित्तीय ऑडिट सार्वजनिक करना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विकास योजनाओं में गुणवत्ता, पारदर्शिता और समयबद्धता सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। यह कथन स्वागतयोग्य है, लेकिन सरकार को यह भी बताना चाहिए कि जिन परियोजनाओं में वर्षों की देरी हुई, जिनकी लागत कई गुना बढ़ी और जिनके निर्माण पर लगातार सवाल उठे, उनके लिए कौन जिम्मेदार है। यदि हर समीक्षा बैठक केवल नए निर्देश देने तक सीमित रहे और किसी अधिकारी की जवाबदेही तय न हो, तो ऐसी समीक्षा प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाती है।

बैठक में कब्रिस्तान घेराबंदी योजना की भी विस्तृत समीक्षा हुई। मुख्यमंत्री ने संवेदनशील स्थलों की सूची बनाकर शीघ्र कार्य पूरा करने और नियमित निगरानी के निर्देश दिए। लेकिन यह योजना नई नहीं है। यदि वर्षों बाद भी वही निर्देश दोहराने पड़ रहे हैं, तो यह उपलब्धि नहीं बल्कि प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती का प्रमाण है। जनता यह जानना चाहती है कि जिन योजनाओं को समय पर पूरा नहीं किया गया, उनके लिए अब तक कितनी जवाबदेही तय हुई।

मुख्यमंत्री ने वर्ष 2037, जब बिहार अपनी स्थापना के 125 वर्ष पूरे करेगा, तब तक "विकसित बिहार" का लक्ष्य रखने की बात कही। लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन वर्तमान की चुनौतियों का सामना किए बिना भविष्य का सपना अधूरा रहेगा। बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है। उद्योगों का योगदान सीमित है और निजी निवेश की गति अपेक्षित नहीं है। यदि बिहार को वास्तव में विकसित राज्य बनाना है तो सबसे पहले उद्योग, कृषि आधारित प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स, कौशल विकास और निजी निवेश पर स्पष्ट, समयबद्ध और मापने योग्य रोडमैप सामने रखना होगा।

मौसम सेवा केंद्र को लेकर मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि पूर्वानुमान सांसदों, विधायकों, मुखियाओं और अधिकारियों तक व्हाट्सएप सहित डिजिटल माध्यमों से समय पर पहुंचाया जाए। यह पहल उपयोगी है, लेकिन बिहार की असली परीक्षा हर वर्ष आने वाली बाढ़ और सूखे के दौरान होती है। सूचना तंत्र तभी सफल माना जाएगा जब उसके साथ राहत, पुनर्वास और आपदा प्रबंधन की क्षमता भी उतनी ही मजबूत हो।

इस पूरी समीक्षा बैठक का सबसे कमजोर पक्ष यह रहा कि रोजगार, औद्योगिक निवेश, एमएसएमई विस्तार, निर्यात, स्टार्टअप पारिस्थितिकी और युवाओं के लिए स्थायी रोजगार सृजन पर कोई ठोस समयबद्ध लक्ष्य सामने नहीं आया। बिहार का सबसे बड़ा संकट आज भी पलायन है। लाखों युवा हर वर्ष बेहतर रोजगार के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। यदि सरकार इस प्रवृत्ति को रोकने में सफल नहीं होती, तो "विकसित बिहार" का सपना केवल सरकारी प्रस्तुतियों तक सीमित रह जाएगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने नई घोषणाओं की लंबी सूची तो पेश कर दी, लेकिन पुरानी घोषणाओं का रिपोर्ट कार्ड सामने नहीं रखा। जनता जानना चाहती है कि पिछले वर्षों में घोषित कितनी योजनाएं समय पर पूरी हुईं, कितनी परियोजनाओं की लागत बढ़ी, कितनी योजनाएं अब भी अधूरी हैं और कितने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। यही असली पारदर्शिता होगी। बिहार को आज एक और पोर्टल, एक और आयोग और एक और विजन दस्तावेज़ से अधिक आवश्यकता ऐसे शासन की है जो फैसले ले, उन्हें समय पर लागू करे और उनकी जवाबदेही भी तय करे। अन्यथा हर नई समीक्षा बैठक एक नया सपना दिखाएगी और हर अगला साल एक नया लक्ष्य घोषित करेगा, जबकि ज़मीन पर वही पुरानी समस्याएं खड़ी रहेंगी।

रिपोर्टर

  • Dr. Rajesh Kumar
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    The Reporter specializes in covering a news beat, produces daily news for Aaple Rajya News

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